SIXTH DAY - SHASHTHI
षष्ठी
आश्विन् शुक्ल षष्ठी तिथि को कात्यायनी देवी की अर्चना का निर्देश है। इंटरनेट पर उपलब्ध वैबसाईटों में एक उल्लेख मिल रहा है कि कात्यायनी देवी का जन्म आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी को हुआ है तथा आश्विन् शुक्ल सप्तमी, अष्टमी व नवमी तिथियों में कात्यायन ऋषि कात्यायनी देवी की पूजा करते हैं। तब दशमी तिथि को कात्यायनी देवी महिषासुर का वध कर पाती है। इस कथन का मूल स्रोत क्या है, यह तो ज्ञात नहीं है, लेकिन कथन अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी तिथि को उन व्यक्तियों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु शस्त्र से, विष से या अस्वाभाविक कारणों से हुई हो। श्राद्ध के कृत्य में यजमान गौ की पूंछ पकड कर यमराज की नगरी से पूर्व विद्यमान वैतरणी नदी को पार करता है। यदि यह नदी पार न हो तो नरक में ही समय व्यतीत करना पडे। भागवत पुराण में मध्यम प्रकार के भक्त की चार स्थितियां कही गई हैं – ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः। अर्थात् जो ईश्वर में प्रेम, उनके आधानों से मैत्री, बालिशों, फैले हुओं पर कृपा और द्वेष करने वालों की उपेक्षा – यह साधना के चार चरण हैं। हमारी कुछ प्रवृत्तियां तो ऐसी होती हैं जो ईश्वर से जुडी हुई ही होती हैं। इनके कारण प्रेम उत्पन्न होता है। प्रेम प्रेमी की बुराईयों की ओर ध्यान नहीं देता, अतः धोखा भी खा जाता है। कुछ प्रवृत्तियां ऐसी होती हैं जिन्हें हम पाते हैं कि दूसरे  भी हमारे जैसे  ही हैं, हमारे ही रास्ते पर चल रहे हैं और हम उससे अपने मन की बात कर सकते हैं, उनसे सहायता, मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। वह हमारे मित्र बन जाते हैं। कुछ प्रवृत्तियां ऐसी होती हैं कि उनके बारे में ठीक – ठीक हमें भी ज्ञान नहीं होता, केवल कुछ – कुछ आभास होता है। एक बालक को इस संसार के बारे में कुछ भी ठीक से ज्ञात नहीं होता, केवल एक आभास होता है। वह अपने परितः विद्यमान व्यक्तियों से समाज के विषय में जानकारी प्राप्त करता रहता है। कहा गया है कि एक बालक अपनी माता से एक दिन में औसत रूप से 300 प्रश्न पूछता है। कुछ प्रवृत्तियां ऐसी होती हैं जिनसे हमें द्वेष हो जाता है, उनके विषय में सोचने – विचारने की आवश्यकता नहीं पडती। कोई शिशु किसी व्यक्ति की गोद में जाना ही नहीं चाहता, कोई पक्षी किसी व्यक्ति को देखकर चिल्लाना आरम्भ कर देता है – यह ऐसी घटनाएं हैं जिनका मूल संभवतः हमारे आभामण्डल में विद्यमान रहता है, मानसिक स्तर पर उसका कारण नहीं होता। यह चतुर्थ प्रकार की द्वेष प्रवृत्ति सिंह आदि आरण्यक पशुओं की प्रवृत्ति है जो किसी भी साधना से रूपान्तरित होने का नाम नहीं लेती (आधुनिक विज्ञान के स्तर पर द्वेष प्रकृति को ऐसा तन्त्र माना जा सकता है जिसे ब्लैक होल कहा जाता है, जिससे कोई उपयोगी कार्य लेने की सारी सम्भावनाएं समाप्त हो गई हैं)। कहा जाता है कि साधना के अन्तिम चरण में यही प्रवृत्ति अपना पूरा जोर लगाती है। बुद्ध को सिद्धि प्राप्त होने से पहली रात्रि में इसी द्वेष रखने वाली मार नामक प्रवृत्ति ने तंग किया था जिस पर बुद्ध ने अपने दृढ संकल्प से विजय पाई। दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, हो सकता है कि क्षुधा भी उन्हीं द्वेषपरक प्रवृत्तियों में से एक हो। यहां साधक को घोर संग्राम करना पडता है जिसमें उसकी मृत्यु भी हो सकती है। सब साधकों में तो बुद्ध जितना दृढ संकल्प नहीं होता। जो साधक चतुर्थ स्तर पर आकर असफल हो गया हो, उसके लिए चतुर्दशी का श्राद्ध है। यहां गाय की पूंछ पकडकर वैतरणी को पार किया जाता है। जैसा कि चतुर्दशी के श्राद्ध के संदर्भ में कहा जा चुका है, गौ हमारी बुद्धि हो सकती है जिसे हमें ब्राह्मण को दान कर देना है, उसे ब्राह्मण की बुद्धि बनाना है और फिर उसकी ही पूंछ पकड कर हमें कठिन रास्ते को पार करना है। समाज में भी ऐसा ही होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपना मार्ग अपने आप नहीं खोज सकता। जब कोई बुद्ध जैसा व्यक्ति जन्म लेता है तो लोग उसकी पूंछ पकड लेते हैं। बुद्ध व्यक्ति को आवश्यक नहीं है कि वह समाज का कल्याण करने के लिए समाज में प्रवेश करे। लेकिन यह उसकी कृपा है कि वह अपनी साधना को बीच में छोडकर समाज के बीच उतरा है। रजनीश ने अपने व्याख्यानों में यह स्पष्ट किया है कि जैन धर्म में जो भी तीर्थंकर हुए हैं, वह सब पुरुष हैं। कोई स्त्री नहीं है। एक स्त्री तीर्थंकर है भी, तो उसे भी पुरुष ही माना जाता है। इसका कारण यह है कि यह समझा जाता है कि स्त्री कठिन संघर्ष के योग्य नहीं है। वह कृपा पर जीवन निर्वाह करती है। उपनिषद में एक कथा आती है कि सत्यकाम जाबालि से किसी ने पूछा कि वह किसका पुत्र है। उसने उत्तर दिया कि उसे भी पता नहीं है कि उसका पिता कौन है। उसने अपनी माता से पूछा तो माता जबाला ने बताया कि उसने बहुत से ऋषियों की सेवा की है। अतः पिता का नाम स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा सकता। हम समाज से जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, यह वही स्थिति है जो सत्यकाम की है। ज्ञान देने वालों के नाम स्पष्ट नहीं होते। यह कहा जा सकता है कि जो भी कृपा पर आश्रित होकर जीता है, वह पुरुष नहीं, स्त्री है। अतः जब यह कहा जाता है कि कात्यायनी देवी का जन्म आश्विन् कृष्ण चतुर्दशी को हुआ है, तो उससे यही समझा जा सकता है कि कात्यायनी स्थिति पूरे समाज से ज्ञान को, कृपा को ग्रहण करने की स्थिति है। हल्की भाषा में इसे वेश्या का धर्म कहा जाता है जो बहुत से पुरुषों की सेवा करती है। वेश्या की आराध्य देवी कात्यायनी होती है और कहा जाता है कि वेश्या – पुत्र को कात्यायन – गोत्रीय कहलाने का अधिकार है। इस प्रकार से ग्रहण किए गए ज्ञान से किसी भारी – भरकम कार्य को सम्पन्न करने की आशा नहीं की जा सकती, लेकिन नवरात्र में कात्यायनी द्वारा महिषासुर के वध का प्रसंग यह दर्शाता है कि किस प्रकार स्त्री धर्म में उत्पन्न कात्यायनी देवी ने महिषासुर के वध करने जैसा भारी भरकम कार्य कर दिखाया। कहा गया है कि सप्तमी, अष्टमी व नवमी तिथियों में कात्यायन ने कात्यायनी देवी की पूजा की, तब दशमी तिथि को कात्यायनी महिषासुर का वध कर पाई। इन तिथियों में कात्यायन ने कात्यायनी की पुष्टि किस प्रकार की ? एक तो उसने अपना सारा तेज कात्यायनी को दिया। दूसरे, सारे देवों ने अपने – अपने तेज देकर कात्यायनी के प्रत्येक अंग का निर्माण किया। तीसरे, प्रत्येक देवता ने अपने – अपने अस्त्र देवी को दिए। कात्यायन द्वारा अपना तेज देना पुरुषार्थ हो सकता है, देवों द्वारा अपने तेज देना दैव हो सकता है। जब दोनों मिल जाएंगे, तभी सिद्धि प्राप्त होगी।
     बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य ऋषि की दो पत्नियां कही गई हैं – मैत्रेयी जो ब्रह्मवादिनी है तथा कात्यायनी जो स्त्रीप्रज्ञा वाली है। स्त्रीप्रज्ञा का क्या अर्थ हो सकता है, यह उपरोक्त विवेचन के आधार पर समझा जा सकता है।
     इंटरनेट पर उल्लेख है कि षष्ठी तिथि को कात्यायनी देवी की आराधना साधक को आज्ञा चक्र में स्थित होकर करनी है।
     सप्तमी तिथि को कालरात्रि देवी की तथा अष्टमी तिथि को महागौरी की पूजा का निर्देश है। षष्ठी तिथि को समझा जा सकता है कि यह दिति, खंड – खण्ड में बंटी हमारी चेतना शक्ति है। इसे वेद में शूर्प कहा गया है। जैसा कि डा. कोठारी ने  सांझी पर लेख में उल्लेख किया है, षष्ठी तिथि को छाबडा, सप्तमी को स्वस्तिक, अष्टमी को अष्टदलकमल, नवमी को डोकरा या वृद्ध दम्पत्ति व दशमी को पंखा संज्ञा देवी के समक्ष रखा जाता है। स्वस्तिक अदिति, अखण्डित शक्ति का प्रतीक है। अदिति शूर्प को हाथ में लेकर उसका उपयोग करती है। सप्तमी तिथि को कालरात्रि देवी की तथा अष्टमी तिथि को महागौरी व नवमी को सिद्धिदात्री देवियों की अर्चना का निर्देश यह दशाएं पूरी करता है या नहीं, यह अन्वेषणीय है।
      
नारद १.११५.३४ ( आश्विन शुक्ल षष्ठी को कात्यायनी देवी की पूजा का विधान ), लक्ष्मीनारायण १.२७१.३४( इष शुक्ल षष्ठी को कात्यायनी देवी की पूजा का महत्त्व ),