SEVENTH DAY - SAPTAMI
सप्तमी
सप्तमी तिथि को साधक द्वारा सहस्रार चक्र में स्थित होकर खर/गदहे पर विराजमान कालरात्रि देवी की अर्चना करने का निर्देश है। कालरात्रि देवी की प्रकृति क्या है, इस विषय में वैदिक साहित्य ने प्रायः मौन ही साधा हुआ है। अतः हमें स्वयं अनुमान लगाना होगा कि कालरात्रि देवी की क्या प्रकृति हो सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि रात्रि के साथ काल शब्द को जोड देना ही कालरात्रि की प्रकृति को स्पष्ट कर देने के लिए पर्याप्त है। कहा गया है कि जहां संवत्सर का निर्माण हो जाता है, वहां काल अस्तित्व में आ जाता है। जहां संवत्सर नहीं बन पाता, वहां काल का अस्तित्व नहीं होता। काल से तात्पर्य है है – काल का उसके अवयवों दिन, रात, पक्ष, मास, संवत्सर आदि में विभाजन। यह विभाजन इस कारण संभव हो पाता है कि सूर्य, चन्द्रमा और पृथिवी एक दूसरे के परितः घूमते हैं। सूर्य, चन्द्रमा व पृथिवी से अध्यात्म में अर्थ लिया जाता है – प्राण, मन और वाक्। जब यह तीनों के दूसरे के परितः घूमने लगते हैं, स्वतन्त्र रहकर अपनी मनमानी करना छोड देते हैं तो काल का निर्माण हो जाता है। यही स्थिति रात्रि के साथ काल को सम्बद्ध करके होनी चाहिए। रात्रि में यह तीनों असम्बद्ध हो जाते हैं। सोते समय पहले वाक् अदृश्य होती है, मन और प्राण रह जाते हैं। फिर मन भी अदृश्य हो जाता है, केवल प्राण रह जाते हैं। फिर यह क्रमशः वापस लौटते हैं।
कालरात्रि का क्या उपयोग है, इस संदर्भ में स्कन्द पुराण काशीखण्ड में कथा आती है कि देवी ने कालरात्रि को दुर्गासुर के वध के लिए भेजा था जिसे कालरात्रि ने पूर्ण किया। दुर्गासुर क्या हो सकता है, इसके लिए दुर्ग क्या होता है, यह समझना होगा। वायु पुराण 1.8 के अनुसार लौकिक रूप में दुर्ग वह होता है जिसमें राजा अपनी रक्षा के लिए सारी रक्षा सामग्री एकत्र करके रखता है। लेकिन वायु पुराण के अनुसार दुर्ग, गृह, शाला यह सब समानार्थक शब्द हैं और इनका अभिप्राय है कि हमारे अस्तित्व के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, वह हमें कल्पवृक्ष की तरह प्राप्त हो जाना चाहिए। लेकिन ऐसी स्थिति तो केवल सात्त्विक भावों के प्रबल होने पर कृतयुग में ही हो सकती है, अन्य युगों में तो दुर्ग की आकृति का ह्रास होता चला जाता है। कहा गया है कि पहले कल्पवृक्ष होते थे, सात्त्विक प्रकृति का ह्रास होने पर वह साधारण वृक्ष बनकर कामनाओं की पूर्ति करने लगे। फिर मनुष्य ने वृक्षों को मापकर उन्हीं की ऊंचाई, चौडाई के अनुसार गृह बनाने आरम्भ कर दिए। तब वही दुर्ग हो गए। उन्हीं में अन्न आदि का संग्रह किया जाने लगा। अतः कालरात्रि देवी का कार्य यह हुआ कि उसे कलियुग से प्रगति करके सत्ययुग तक पहुंचना है जहां कल्पवृक्ष सिद्ध हो जाएं। यह कार्य कालरात्रि किस प्रकार करती होगी, इसका उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है कि किसी भी सोमयाग के मुख्य यज्ञ को आरम्भ करने से पहले एक रात्रि का कृत्य सम्पन्न किया जाता है जिसे प्रायणीय अतिरात्र कहते हैं। कहा गया है कि
८. भूतं वै पूर्वोऽतिरात्रो भव्यमुत्तरः । काठ ३४.८ ।
९. भूतं पूर्व्वोऽतिरात्रो भविष्यदुत्तरः पृथिवी पूर्व्वोऽतिरात्रो द्यौरुत्तरोऽग्निः पूर्वोऽतिरात्र आदित्य उत्तरः प्राणः पूर्वोऽतिरात्र उदान उत्तरः । तां १०.४.१ ।
अर्थात् जो प्रायणीय अतिरात्र है, उससे भूतकाल की सूचना मिलने लगती है। इसके पश्चात् यज्ञ के अन्त में एक उदयनीय अतिरात्र नामक कृत्य होता है जिससे भविष्य की सूचना मिलने लगती है। अब रात्रि काल की सूचना देने लगी है। अतः यह कालरात्रि कहलाने योग्य है। कहा गया है कि यह जो प्रायणीय अतिरात्र और उदयनीय अतिरात्र हैं, यह अदिति, अखण्ड शक्ति के ही रूप हैं। अदिति को पथ्या स्वस्ति कहा गया है, अर्थात् वह हमें किस मार्ग से आगे बढना है, इसका निर्देश देती है। यह प्रत्येक परिस्थिति के विषय में सत्य कहा जा सकता है। भावी कर्म का निर्देश तभी मिल पाता है जब हम किसी कार्य के विषय में पूरी तन्मयता से विचार करते हैं। कालरात्रि का अदिति स्वरूप होना सांझी के संदर्भ में सप्तमी तिथि को सांझी के साथ स्वस्तिक को सम्बद्ध करने की भी व्याख्या कर देता है। स्वस्ति अदिति ही करती है। सप्तमी रूपी अदिति षष्ठी रूपी दिति को संभालती है।  
     तैत्तिरीय संहिता ६.१.७.५ आदि का कथन है कि अदिति प्रायणीय है, अदिति उदयनीय है। यह दो शीर्षों वाली है। जब अदिति का रूप प्रायणीय होगा तो पृथिवी पर स्थित होकर जो कुछ उपलब्धि की जा सकती है, जैसे ५ दिशाओं पर विजय, ओषधि, वनस्पतियों पर विजय, चेतना को असीमित बनाना आदि, वह सब करने से अदिति/अखण्डित शक्ति का रूप प्राप्त होगा। जब अदिति का रूप उदयनीय होगा तो अदिति का कार्य आदित्य रूपी पुत्र को जन्म देना होगा। ब्रह्माण्ड पुराण आदि में अदिति के स्थान पर कश्यप व दिति/खण्डित शक्ति के यज्ञ का उल्लेख है। ऐसी स्थिति में हिरण्यकशिपु के जन्म की अपेक्षा की जा सकती है।
     जैमिनीय ब्राह्मण ३.१७५ के अनुसार प्रायणीय अतिरात्र रथवत् है। इस प्रायणीय अतिरात्र में अग्नि ऊर्ध्व दिशा में प्रयाण या गमन करता है और ज्योति का रूप धारण करता है। यह संवत्सर के १३वें मास जैसा है(जैमिनीय ब्राह्मण ३.३८६)। दूसरी ओर, उदयनीय अतिरात्र मनुष्य के हस्त जैसा है। यह १३वें अतिरिक्त मास के पश्चात्(२४ पक्षों वाले?)संवत्सर के प्रकट होने जैसा है। प्रायणीय अवरोधन है जबकि उदयनीय उद्रोधन है(ऐतरेय ब्राह्मण ४.१४)। प्रायणीय अतिरात्र प्राण है, जबकि उदयनीय अपान अथवा उदान(ऐतरेय ब्राह्मण ४.१४, जैमिनीय ब्राह्मण ३.३१९, तैत्तिरीय संहिता ७.५.१.३ आदि)। एक सूर्य है तो दूसरा चन्द्रमा। तैत्तिरीय संहिता ७.५.१.३ के अनुसार जो पूर्व अतिरात्र है, वह मन जैसे है, जो उत्तर अतिरात्र है, वह वाक् जैसे है।
     ताण्ड्य ब्राह्मण 9.1.1 के कथन का अभिप्राय यह है कि जब हम अज्ञान रूपी रात्रि से ग्रस्त होते हैं तो यह नहीं जान पाते कि हम अपने कर्तव्य में कहां-कहां त्रुटि कर रहे हैं। जैसे ही हमें ज्ञान रूपी दिन की कोई झलक मिलती है, हम तुरंत अपनी त्रुटियों को सुधारने की ओर अग्रसर होते हैं। कर्मकाण्ड में ज्ञान-अज्ञान या त्रुटि का मापन इस योग्यता से किया जाता है कि हम प्रकृति में जड पडे हुए सोम का अमृत सोम में विकास किस सीमा तक कर सकते हैं। ताण्ड्य ब्राह्मण ९.२.१९ में एक आख्यान आता है कि देवातिथि अरण्य में अपने पुत्र के साथ भूखा घूम रहा था। उसको उर्व्वारुक(ककडी) मिली। उसने अपने साम से उनकी उपासना की जिससे वह पृश्नि गौ में रूपान्तरित हो गई। यह कथन कालरात्रि की प्रकृति की परोक्ष रूप में व्याख्या करता है।
     यह उल्लेखनीय है कि वेदमन्त्रों में प्रकट हुए दुर्ग शब्द (जैसे रथं न दुर्गाद् वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो निष्पिपर्तन) के सायणाचार्य द्वारा किए गए भाष्य(दुर्ग – ऊंचा – नीचा स्थान जिससे रथ की रक्षा करनी होती है) तथा पुराणों में प्रकट हुए दुर्ग शब्दों में सामञ्जस्य स्थापित नहीं हो पाया है।
संदर्भ
*ब्रा॒ह्म॒णासो॑ अतिरा॒त्रे न सोमे॒ सरो॒ न पू॒र्णम॒भितो॒ वद॑न्तः। सं॒व॒त्स॒रस्य॒ तदहः॒ परि॑ ष्ठ॒ यन्म॑ण्डूका प्रावृ॒षीणं॑ ब॒भूव॑॥ - ऋ. ७.१०३.७
*दे॒वाः पि॒तरो॑ मनुष्या गन्धर्वाप्स॒रस॑श्च॒ ये। ते त्वा॒ सर्वे॑ गोप्स्यन्ति॒ साति॑रा॒त्रमति॑ द्रव॥ - अथर्ववेद १०.९.९
*स य ए॒वं वि॒द्वान्त्स॒र्पिरु॑प॒सिच्यो॑प॒हर॑ति। याव॑दतिरा॒त्रेणे॒ष्ट्वा सुस॑मृद्धेनावरु॒न्धे ताव॑देने॒नाव॑ रुन्द्धे। स य ए॒वं वि॒द्वान् मधू॑प॒सिच्यो॑प॒हर॑ति। - - - - अथर्ववेद ९.९.५
*याव॑ती पौर्णमा॒सी तावा॑नु॒क्थ्यो॑ याव॑त्यमावा॒स्या॑ तावा॑नतिरा॒त्रो – तै.सं. १.६.९.१
*अश्वमेधगतमन्त्रकथनम्-- आ माऽग्निष्टोमो विशतूक्थ्यश्चातिरात्रो माऽऽविशत्वापिशर्वरः (अपिशर्वरः--पठितव्यानि स्तोत्राणि यस्या -- सायणाचार्य)। - तै.सं. ७.३.१३.१
*रराट्यालम्भनं वा षोडशिनि, छदिरतिरात्रे – कात्यायन श्रौत सूत्र ९.३.१६
*अद्येत्यतिरात्रे – आश्व.श्रौ.सू. ६.११.१४
*अतिरात्रं कुर्वाणेषु द्विरात्रं। द्विरात्रं कुर्वाणेषु त्रिरात्रं। - शांखायन श्रौत सूत्र १३.५.१९
*ऐन्द्राग्नमुक्थे। ऐन्द्रं षोडशिनि। सारस्वतमतिरात्रे। - आप. श्रौ.सू. १२.१८.१३
*उक्थ्यः षोडशी अतिरात्रो ऽप्तोर्यामश्चाग्निष्टोमस्य गुणविकाराः। उक्थ्येन पशुकामो यजेत, षोडशिना वीर्यकामः, अतिरात्रेण प्रजाकामः पशुकामो वा। अप्तोर्यामेण अतिरात्रेण सर्वान् कामानवाप्नोति। तेषाँ अग्निष्टोमवत्कल्पः। - आप. श्रौ.सू. १४.१.१
*अतिरात्रे पशुकामस्य। अतिरात्रे ब्रह्मवर्चसकामस्य। - आप.श्रौ.सू. १४.२.९
*अग्निष्टोमेन वै देवा इमं लोकमभ्यजयन्नन्तरिक्षमुख्थेनातिरात्रेणामुन्त इमं लोकं पुनरभ्यकामयन्त त इहेत्यस्मिन् लोके प्रत्यतिष्ठन् यदेत्साम भवति प्रतिष्ठित्यै। - तां.ब्रा. ९.२.९
*यदीतरोऽग्निष्टोमः स्यादुक्थः कार्य्यो यद्युक्थोऽतिरात्रो यो वै भूयान्यज्ञक्रतुः स इन्द्रस्य प्रियो भूयसैवैषां यज्ञक्रतुनेन्द्रं वृङ्क्ते। - तां.ब्रा. ९.७.१५
*उक्थानि वा एष निकामयमानोऽभ्यतिरिच्यते योऽग्निष्टोमादतिरिच्यते यद्युक्थेभ्योऽतिरिच्येतातिरात्रः कार्य्यो रात्रिं वा एष निकामयमानोऽभ्यतिरिच्यते य उक्थेभ्योऽतिरिच्यते यदि रात्रेरतिरिच्येत विष्णोः शिपिविष्टवतीषु बृहता स्तुयुरेष तु वा अतिरिच्यत इत्याहुर्यो रात्रेरतिरिच्यत इति।११। अमुं वा एष लोकं निकामयमानोऽभ्यतिरिच्यते यो रात्रेरतिरिच्यते बृहता स्तुवन्ति बृहदमुं लोकमाप्तमर्हति तमेवाप्नोति।१२। - तां.ब्रा. ९.७.११
अतिरात्र (यज्ञः)
१. अतिरात्रात् साकमेधान् यज्ञक्रतुं निर्मायेन्द्रो वृत्रमहन् । मै १, १०, ५; काठ ३५, २०; क ४८, १८ ।
२. अतिरात्रेणामुम् (द्युलोकमभ्यजयन् देवाः) । तां ९.२.९ ।
३. एष ह वा उभयतो ज्योतिर्यज्ञक्रतुर्यदतिरात्रः । जै १.२३ २ ।
४. चक्षुषी अतिरात्रौ । तां १०.४.२ ।
५. तस्य (संवत्सररूपिणः समुद्रस्य) एतत् पारं यदतिरात्रौ । तैसं ७,५,१,३ ।
६. प्रतिष्ठा वाऽअतिरात्रः । माश ५.५.३.५ ।
७. प्राणो वै पूर्वोऽतिरात्रोऽपान उत्तर इयं (पृथिवी) वै पूर्वोऽतिरात्रोऽसा (द्यौः) उत्तरः । काठ ३४.८ ।
८. भूतं वै पूर्वोऽतिरात्रो भव्यमुत्तरः । काठ ३४.८ ।
९. भूतं पूर्व्वोऽतिरात्रो भविष्यदुत्तरः पृथिवी पूर्व्वोऽतिरात्रो द्यौरुत्तरोऽग्निः पूर्वोऽतिरात्र आदित्य उत्तरः प्राणः पूर्वोऽतिरात्र उदान उत्तरः । तां १०.४.१ ।
१०. ये देवयाना पन्थानस्तेष्वतिरात्रेण (प्रतितिष्ठति) । काठ १४.९ ।
११. वाचमतिरात्रेण (स्पृणोति) । काठ १४,९ ।
१२. संवत्सरस्य वा एतौ दंष्ट्रौ यदतिरात्रौ तयोर्न स्वप्तव्यं संवत्सरस्य दंष्ट्रयोरात्मानन्नेदपिदधा- नीति । तां १०.४.३ ।
१३. स कृत्स्नो विश्वजिद्योऽतिरात्रः । कौ २५,१४ ।
१४. सारस्वती मेष्यतिरात्र आलभ्या । मै ३.९.५ ।
१५. सोऽतिरात्रेणाऽऽदित्यानयाजयत् (प्रजापतिः) तेऽमुं(द्यु-)लोकमजयन् । तैसं ७, १,५, ३ ।
१६. स्वर्( स्वाराज्यम् (मै.). अतिरात्रेण (अभिजयति) । मै. १.८.६., तै ३,१२.५.७ ।
१७. चक्षुषी वा एते यज्ञस्य यदतिरात्रौ, कनीनिके अग्निष्टोमः इति।  तै.ंसं. ७.२.९.१, काठ.सं. ३७.८ ।
 
रात्रि त्री-
१ अथास्या (शचिष्ठायाः) एतत् पृश्निशबलं ( सत्यानृतमयमुभयविधमिश्रितम्) पदं यद्रात्रिः । जै २,२५९ ।
रे. अनुवाऽसि रात्रियै त्वा रात्रिं जिन्व । तैसं ४,४, १, १ ।
३ अनुवेति रात्रिम् (असृजत) । तैसं ५,३, ६.१ ।
४. अहर्वै पूर्वाह्णो रात्रिरपराह्णः । जै. २,९८ ।
५. अहर्वै स्तोत्रियो रात्रिरनुरूपः । जै ३,२१ ।
६ आनुष्टुभी ( वै [काठ., ऐ.) रात्रिः ( ०त्री [काठ.।) । मै ३, ९.५. काठ ६, ८; ऐ ४.६ । ७. आनुष्टुभेन च्छन्दसा रात्रीमुपदधे । काठ ३८,१२ ।
८. इय चं रात्रिः सर्वेषां भूतानां प्राणैरप प्रसर्पति चोत्सर्पति च । तैआ १, १४, ४ ।
९ ऋतं रात्रिः । सत्यं तदहः । जै ३, ३७३ ।
१०. एष रात्रिया ( वर्णः) यत् कृष्णम् । तैसं ६, १, ३,२ ।
११. एषा वा अग्निष्टोमस्य सम्मा यद् रात्रिः. .. एषा वा उक्थस्य सम्मा यद् रात्रिः । .. एषा वा अग्निष्टोमस्य च संवत्सरस्य सम्मा यद् रात्रिः.. एषा वै ब्रह्मस्य विष्टपं यद् रात्रिः । जै १ .२०६ ।
१२. क्षेमो रात्रिः । माश १३, १, ४,३ ।
१३. चतुर्विशति रात्र्या (रात्रिपर्यायस्य) उक्थामदानि । जै. १, २१२ ।
१४ छन्नेवाह्वो रात्रिः ।  छन्ना वै रात्रिः । जै १, ३४० ।
१५. तम इव हि रात्रिर्मृत्युरिव । ऐ ४,५ ।
१६. तमः पाप्मा रात्रिः । कौ १७,६, १७.९, गो २,५, ३ ।
१७. तमो रात्रिः । तैसं १,५,९,५ ।
१८. द्वादशस्तोत्राणि रात्रिः । तां ९,१.२३-२४ ।
१९. नास्य नक्तं रक्षांसीशते य एवं वेद । काठ ७,१० ।
२०. मृत्योस्तम इव हि रात्रिः । गो २,५,१ ।
२१ यजमानदेवत्यं वा अहः । भ्रातृव्यदेवत्या रात्रिः । तै २, २,६, ४ ।
२२. यदरात्समिति ता रात्रयः । जै. ३,३८० ।
२३. या (अपः) नक्तं गृह्णाति या आद्याः प्रजास्तासामेता (आपः) योनिः । मै ४,५.१ । २४. रातं वा अस्मा अभूदिति सो एव रात्रिरभवत् । जै ३,३५७ ।
२५ रात्रिरिव प्रियो भूयासम् । ऐआ ५,१, १ ।
२६. रात्रिरेव श्रीः श्रियां  हैतद्रात्र्यां सर्वाणि भूतानि संवसन्ति । माश १० २.६. १६ । २७. रात्रिर्वरुणः । ऐ ४,१०; जै १,३१२; तां २५, १०,१० ।
२८. रात्रिर्वात्सप्रम् (सूक्तम्) । माश ६,७,४.१२ ।
२९. रात्रिर्वै व्युष्टिः । माश १३, २, १, ६ ।
३०. रात्रिर्वै संयच्छन्दः । माश ८.५..२.५ ।
३१ रात्रिः सावित्री । गो १, १, ३३ ।
३२ रात्रीं पीवसा (प्रीणामि) । काठ ५३, १० ।
३३. रात्र्या (पर्यायेण) त्वाव सर्वमवरुन्द्धे । जै १, २०७ ।
३४ वारुणी रात्रिः । तैसं २, १, ७, ३; मै १, ८,८; तै १, ७,१०.१ ।
३५. शर्वरी वै नाम रात्रिः । जै १,२०९ ।
३६. सगरा रात्रिः । माश १.१७.२.२६ ।
३७. स दर्भेण रजतं हिरण्यं प्रबध्य पुरस्ताद्धरेत् । तच्चन्द्रमसो रूपं क्रियते । रात्रेर्वा एतद्रूपम् । जै १, ६३ (तु. माश १२.४.४, ७) ।
३८. सोमो रात्रिः । माश ३.४.४, १५ ।।
२. अहरेव दर्शोऽहरु हीदं ददृश इव, रात्रिरेव पूर्णमा, रात्र्या हीदं सर्वं पूर्णम् । काश ३.२.९, १ ।
८. अहर्मे पिता रात्रिर्माता । जै १,५० ।
९. अहर्वै ऋतं रात्रिः सत्यम् । मै ३,१,६ ।
१३ अहर्वै वत्सो ( श्वेतः) रात्रिर्माता ( कृष्णा धेनुः) । मे ३,३,९ ।
१५. अहर्वै शबलो रात्रिः श्यामः । कौ २,९, जै १,६ । १६. अहर्वै सुवर्णं रात्री रजतम् । जै २,९८ ।
२१ अह्नो वै रूपं धाना रात्र्यास्तण्डुलाः । काठ ११, २ ।
२५ एतद्वा अह्नो रूपं यच्छुक्लम् (यद्रात्रिः (तै.सं,) । तैसं ३३.४, १; मै. २,५,७ ।
२८. क्षेपीयसी ह खलु रात्रिरह्नः । जे १, १८९ ।
३४ ब्रह्मणो वै रूपमहः क्षत्रस्य रात्रिः । तै ३, ९, १४. ३ ।
४२ व्यञ्जनैरेव रात्रीराप्नुवन्ति स्वरैरहानि । ऐआ २,२,४ ।
४५. सामभिर्वा अहान्यभिष्टुतान्यृग्भी रात्रयः । जै २,३७ ।
४६. अग्निर्वै रात्रिरसा आदित्योऽहः। - मै. १.५.९
४७. अग्नी रात्र्यसा आदित्योऽहः – काठ. ७.६
४८ अन्धो रात्रिः (अच्छेतः सोमः(काठ.) काठ. .३४.१०, तां ९.१.७
४९. चन्द्रमसेऽपराह्णे तस्मिञ्छतमानं हिरण्यं ददाति रजतम् . .. .रात्रिरपराह्णः – जै. २.९८
५०. अहरेव प्राणो रात्रिरपानः – ऐ.आ. २.१.५
५१. अहर्वै देवानामासीद्रात्र्यसुराणाम् – काठ ७.६, क ५.५( तु. तै.सं. १.५.९.२)
५२. रात्र्या असुरान् (असृजत) ते कृष्णा अभवन्। काठ. ९.११
५३. असुर्या (०र्यो (मै. .3.६.६) वै रात्रिः (वर्णेन शुक्रियमहः(काठ.) – मै. १.८.६,  ३.६.६, काठ. ८.३
५३. आग्नेयी (वै(तै.)) रात्रिः (ऐन्द्रमहः(काठ., क.) तै.सं. १.५.९.३, काठ. ८.३, क.     ६.८, तै.१.१.४.२, १.५.३.४, २.१.२.७ (तु. जै.१.१८८, तै. १.१.४.३)
५४. रात्रेर्वत्सः श्वेत आदित्यः – तै.आ. १.१०.५
५५. त्रीणि षष्टिशतान्यूष्मणां यानूष्मणो ऽवोचाम, रात्रयस्ता- - ऐ.आ. ३.२.२
 
 
कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि।
तन्नो दुर्गि- प्रचोदयात्।। - तै.आ. 10.1.7
कृत्तिं वस्त इति कात्यो रुद्रः। स एवायनमधिष्ठानमुत्पादको यस्या दुर्गायाः सा कात्यायनी। कुत्सितमनिष्टं मारयति निवारयतीति कुमारी। कन्या चासौ कुमारी चेति कन्यकुमारी। दुर्गिर्दुर्गा। - सायण भाष्य
कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥ ६॥ - देवी उपनिषद
तासां द्वे ब्रह्मणे प्रायच्छद् वाचं च ज्योतिश् च। वाग् वै धेनुर् ज्योतिर् हिरण्यम्। तस्माद् आग्न्याधेयिकां चातुःप्राश्यां धेनुं ब्रह्मणे ददाति। ब्रह्मणे हि प्रत्ता। पशुषु शाम्यमानेषु चक्षुर् हापयन्ति। चक्षुर् एव तद् आत्मनि धत्ते। यद् वै चक्षुस् तद् धिरण्यम्। तस्माद् आग्न्याधेयिकं हिरण्यं ब्रह्मणे ददाति। ब्रह्मणे हि प्रत्तं। तस्यात्मन्न् अधत्त। तेन प्राज्वलयत्। यन् नाधत्त तद् आग्लाभवत्। तद् आग्ला भूत्वा सा समुद्रं प्राविशत् । सा समुद्रम् अदहत्। तस्मात् समुद्रो दुर्गिरपि । वैश्वानरेण हि दग्धः। सा पृथिवीम् उदैत्। सा पृथिवीं व्यदहत्। सा देवान् आगच्छत्। सा देवान् अहेडत्। ते देवा ब्रह्माणम् उपाधावन्। स नैवागायन् नानृत्यत्। सैषाग्ला – गोपथ ब्रा. 1.2.21
 
मत्स्य ८०.२ ( आश्विन् शुक्ल सप्तमी को शुभ सप्तमी व्रत की विधि : कपिला गौ का दान आदि ), लक्ष्मीनारायण १.२७२.४०( आश्विन् शुक्ल सप्तमी को पञ्चगव्य व्रत का निर्देश ),
 
कालरात्रि गरुड १.४१ ( स्त्री प्राप्ति हेतु कालरात्रि मन्त्र जप का निरूपण ), देवीभागवत ५.२३.४  ( पार्वती के शरीर से अम्बिका के नि:सृत हो जाने पर कृष्ण रूप की कालिका तथा कालरात्रि रूप से प्रसिद्धि का उल्लेख ), नारद १.६६.११६( लोहित की शक्ति कालरात्रि का उल्लेख ), १.६६.१३६( व्यापी गणेश की शक्ति कालरात्रि का उल्लेख ), ब्रह्माण्ड ३.४.४४.६० ( कालरात्रि का वर्ण - शक्ति के रूप में उल्लेख ), भविष्य १.३३.२५( सर्प के ४ विषदंष्ट्रों की देवताओं में से एक, स्वरूप ), महाभारत शान्ति ३४७.५३ ( हयग्रीव रूप धारी श्री हरि की ग्रीवा रूप में कालरात्रि का उल्लेख ), शिव ५.८.१९ (२८ नरक कोटियों में से अष्टम कोटि का कालरात्रि नाम से उल्लेख ), स्कन्द ४.२.७१.२५ ( माहेश्वरी के आह्वान पर कालरात्रि का आगमन, दूती बनाकर दुर्ग नामक असुर के पास प्रेषण, दुर्ग का कालरात्रि पर मोहित होने का वृत्तान्त ) , ५.३.१४.३२ (क्रुद्ध शिव की हुंकार से सौम्य महेश्वरी का कालरात्रि सदृश रौद्र रूप धारण करके जगत को भस्म करने का उल्लेख ), योगवासिष्ठ ६.२.८१.२४ ( छाया की भांति शिव के शरीर से निर्गत कालरात्रि के स्वरूप का वर्णन ) , कथासरित् ३.६.१०४ ( विष्णुदत्त - पत्नी कालरात्रि का डाकिनी मन्त्रों की गुरु के रूप में उल्लेख, कालरात्रि चरित्र का वर्णन ), १५.१.७० ( त्रिशीर्ष नामक गुफा की रक्षार्थ गुफा के उत्तर द्वार पर शिव द्वारा कालरात्रि प्रभृति स्व शक्तियों को स्थापित करने का उल्लेख ) । kaalaraatri