PRATIPADA - FIRST DAY
प्रतिपदा
नवरात्र की प्रतिपदा तिथि को शैलपुत्री नामक देवी की अर्चना का विधान है। शैलपुत्री देवी को वृषभ पर आरूढ दिखाया गया है। यह संकेत देता है कि वृषभ के विभिन्न अंगों पर न्यास की जितनी साधना है, वह होनी चाहिए। शैल अपने अन्दर रत्नों को धारण करता है। हमारा चित्त, जिसमें अचेतन संस्कार भरे पडे हैं, रत्नों को धारण करने वाला सुचित्त शैल बनना चाहिए। कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट उत्सव मनाया जाता है। अन्नकूट का अर्थ है कि अन्नों में जो सर्वाधिक श्रेष्ठ है,उसका पहाड खडा हो गया है। इस अन्नकूट के निर्माण की प्रक्रिया आश्विन् प्रतिपदा को ही आरम्भ हो गई है। चित्त जितना जाग्रत बनता जाएगा, उतना ही अन्नाद्य, अन्नों में श्रेष्ठ अन्न उत्पन्न होता जाएगा।
लक्ष्मीनारायण १.२६६.४१( आश्विन् शुक्ल प्रतिपदा को अशोक वृक्ष की पूजा का निर्देश, नवरात्र का आरम्भ ),
SECOND DAY - DVITEEYAA
द्वितीया
द्वितीया तिथि को ब्रह्मचारिणी देवी की आराधना का निर्देश है। हरिवंश पुराण 1.3 में ब्रह्मचारिणी को बृहस्पति की भगिनी, अष्टम वसु प्रभास की भार्या व विश्वकर्मा की माता कहा गया है। विश्वकर्मा से संकेत मिलता है कि यह पुरुषार्थ की उच्चतम स्थिति है जिसमें दैव अक्रिय हो जाता है।
THIRD DAY - TRITEEYAA
तृतीया
पुराणों में आश्विन् शुक्ल तृतीया का उल्लेख बहुत कम हुआ है, जबकि चैत्र शुक्ल तृतीया के लक्षणों का पर्याप्त रूप से उल्लेख आता है। अतः आश्विन् शुक्ल तृतीया के लक्षणों को चैत्र शुक्ल तृतीया के लक्षणों के आधार पर समझने का प्रयत्न किया जा सकता है। नवरात्र की तृतीया तिथि को प्रायः चन्द्रघण्टा देवी की अर्चना का उल्लेख किया जाता है। स्कन्द पुराण काशीखण्ड में चन्द्रघण्टा शब्द के बदले चित्रघण्टा शब्द का उल्लेख है ---
चित्रकूपे नरः स्नात्वा विचित्रफलदे नृणाम् ।।
चित्रगुप्तेश्वरं वीक्ष्य चित्रघंटां प्रपूज्य च ।। ३८ ।।
बहुपातकयुक्तोपि त्यक्तधर्मपथोपि वा ।।
न चित्रगुप्तलेख्यः स्याच्चित्रघंटार्चको नरः ।। ३९ ।।
योषिद्वा पुरुषो वापि चित्रघंटां न योर्चयेत् ।।
काश्यां विघ्नसहस्राणि तं सेवंते पदेपदे ।।4.2.70.४०।।
चैत्रशुक्लतृतीयायां  कार्या यात्रा प्रयत्नतः ।।
महामहोत्सवः कार्यो निशि जागरणं तथा ।। ४१ ।।
महापूजोपकरणैश्चित्रघंटां समर्च्य च ।।
शृणोति नांतकस्येह घंटां महिषकंठगाम् ।। ४२ ।।
कहा जा रहा है कि चित्रकूप में स्नान से विचित्र फल मिलता है। चित्रगुप्तेश्वर का दर्शन करके तथा चित्रघंटा का पूजन करके जो मनुष्य बहुत पातक युक्त होता है अथवा जिसने धर्मपथ का त्याग कर दिया होता है, वह भी चित्रगुप्त की लेखनी से बच निकलता है। जो स्त्री या पुरुष चित्रघंटा की अर्चना नहीं करते, उन्हें काशी में पद – पद पर हजार विघ्न झेलने पडते हैं। चैत्रशुक्ल तृतीया को प्रयत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिए, महामहोत्सव तथा रात्रि में जागरण करना चाहिए। महापूजा के उपकरणों द्वारा चित्रघंटा की अर्चना करने से मृत्यु के महिष के गले में बंधा घंटा सुनाई नहीं पडता। चित्र शब्द को चित्त के रूप में ग्रहण करना चाहिए। हमारी देह में मुख में स्थित जिह्वा घंटे की जिह्वा के समान है। जब हम कोई स्वादिष्ट पदार्थ मुख में रखते हैं तो चित्त का घंटा बोलने लगता है, अन्यथा वह चुप ही रहता है। इसके अतिरिक्त, जिह्वा का  स्वाद भी चित्त की जानकारी देता रहता है। योग में एक ऐसी स्थिति का भी उल्लेख है जहां जिह्वा उल्टी होकर कपालकुहर से स्रवित होने वाले रस का आस्वादन करने लगती है। वह चन्द्रघंटा की स्थिति हो सकती है। तृतीया तिथि को लवण रस का निषेध है। अपितु लवण का दान करने का निर्देश है। कपाल कुहर से स्रवित रस के विषय में भी ऐसा ही निर्देश है कि लवण रस को त्याग कर अन्य रसों का आस्वादन करना चाहिए।
कहा गया है कि चैत्र शुक्ल तृतीया को हर व गौरी का विवाह हुआ था, अतः इस तिथि में उमा – महेश्वर का विभिन्न नामों से अपनी देह में न्यास किया जाता है। विवाह का परिणाम यह होता है कि प्रकृति तथा पुरुष दोनों जरा से मुक्त हो जाते हैं। यह उल्लेखनीय है कि आश्विन् मास का नाम इष है जबकि कार्तिक मास का नाम ऊर्ज है। इषम् अन्न का भी नाम है और वर्षा का भी। कामनाओं की पूर्ति होने को दिव्य वर्षा कहा जाता है। आश्विन मास में कन्या राशि की प्रधानता है, कन्या के विवाह की नहीं। कार्तिक मास में तुला राशि की प्रधानता हो जाती है जिसमें प्रकृति जितना पुरुष से ग्रहण करती है, उतना ही उसको देती भी है। आश्विन् मास में प्रकृति केवल ग्रहण करने वाली है। अतः यहां विवाह का प्रश्न नहीं उठना चाहिए।
     तृतीया तिथि को सार्वत्रिक रूप से गौरी की पूजा का निर्देश है, चाहे किसी भी मास की तृतीया तिथि हो। केवल गौरी का स्वरूप बदल जाएगा। आश्विन् मास में बृहद्गौरी की अर्चना का निर्देश है। गौरी को पुराण में वरुण की शक्ति कहा गया है। इससे अधिक गौरी के लक्षणों का रहस्योद्घाटन नहीं हो पाया है। इंटरनेट पर चन्द्रघण्टा देवी को मणिपूर चक्र से सम्बन्धित कहा जा रहा है।
 
 
अग्नि १७८ (चैत्र शुक्ल तृतीया में करणीय गौरी - शंकर पूजन व न्यासादि का वर्णन), १७८.२७ (चैत्र में दमनक तृतीया तथा मार्गशीर्ष में आत्म तृतीया व्रत का कथन), नारद १.११२.४५(आश्विन् शुक्ल तृतीया को बृहद् गौरी तृतीया व्रत की विधि), पद्म १.२९ (चैत्र शुक्ल तृतीया में सौभाग्य शयन व्रत, गौरी - शंकर न्यास), मत्स्य ६० (चैत्र शुक्ल तृतीया : सती - शिव की आराधना व न्यास), स्कन्द ४.१.४९.८१ (चैत्र शुक्ल तृतीया : मङ्गला गौरी की पूजा), ४.२.७०.४१ (चैत्र शुक्ल तृतीया : चित्रघण्टा आदि की पूजा), ४.२.९०.२२ (चैत्र शुक्ल तृतीया : पार्वतीश लिङ्ग की अर्चना), ५.३.२६.१३४ (चैत्र शुक्ल तृतीया में करणीय दुःख व दौर्भाग्य नाशक व्रत विधि का वर्णन), ६.४२+ (चैत्र शुक्ल तृतीया : विश्वामित्र व मेनका का आख्यान), ६.१५३ (चैत्र शुक्ल तृतीया : रूप तीर्थ का माहात्म्य, तिलोत्तमा की कथा), ७.१.१२० (चैत्र शुक्ल तृतीया : गोपीश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.२६५ (चैत्र शुक्ल तृतीया : कनकनन्दा देवी की पूजा), ७.१.२९१ (चैत्र तृतीया : भद्रकाली की पूजा), लक्ष्मीनारायण १.२६८.७१( इष शुक्ल तृतीया को बृहद्गौरी व्रत की विधि ), १.४८६.३ (चैत्र शुक्ल तृतीया : मध्याह्न सूर्यवार के प्रभाव से जल में प्राण त्याग करने पर मृगी के मेनका नामक अप्सरा बनने का उल्लेख), ४.६१.६६ (चैत्र शुक्ल तृतीया में सारहास मण्डलवर्ती लोगों को मुक्ति प्राप्ति),
तृतीया अग्नि १७८ (चैत्र शुक्ल तृतीया में करणीय गौरी - शंकर पूजन व न्यासादि का वर्णन), १७८.२७ (चैत्र में दमनक तृतीया तथा मार्गशीर्ष में आत्म तृतीया व्रत का कथन), कूर्म २.४२.२२/ २.४०.१५ (शुक्ल पक्ष की तृतीया में कन्या तीर्थ में स्नान का उल्लेख), गरुड १.११६.४ (तृतीया तिथि में त्रिदेव, गौरी - विघ्नेश - शंकर पूजा), १.१२० (रम्भा तृतीया व्रत का वर्णन), १.१२९.४ (गौरी व्रत का वर्णन), देवीभागवत ८.२४.३७ (द्वादश मासों की शुक्ल तृतीया तिथियों में देवी को नैवेद्य अर्पण का विधान), नारद १.११२ (तृतीया तिथि के व्रतों का वर्णन : गौरी पूजा, रम्भा व्रत, अक्षय तृतीया, विष्णु गौरी व्रत आदि), २.२३.७० (तृतीया को लवण का वर्जन), पद्म १.२२.१०६ (माघ शुक्ल तृतीया में करणीय रस कल्याणिनी व्रत का विधान), १.२९ (चैत्र शुक्ल तृतीया में सौभाग्य शयन व्रत, गौरी - शंकर न्यास), ५.३६.७१ (वैशाख शुक्ल तृतीया में सीता की शुद्धि परीक्षा), भविष्य १.२१ (गौरी तृतीया व्रत विधि का वर्णन), ४.२५+ (विभिन्न तृतीया व्रतों का माहात्म्य), मत्स्य ६० (चैत्र शुक्ल तृतीया : सती - शिव की आराधना व न्यास), ६२ (अनन्त तृतीया व्रत : ललिता न्यास, मास अनुसार पुष्प द्वारा पूजा), ६३ (रस कल्याणिनी तृतीया व्रत : ललिता न्यास, मासों में भक्ष्याभक्ष्य), ६४ (आर्द्रानन्दकरी तृतीया : शिव - पार्वती न्यास), ६५ (वैशाख शुक्ल तृतीया : अक्षय तृतीया व्रत, विष्णु पूजा), विष्णुधर्मोत्तर १.२२९.४ (वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया का संक्षिप्त माहात्म्य), ३.२२१.१८(तृतीया तिथि को पूजनीय देवताओं के नाम तथा फल), शिव ५.५१.५४ (विभिन्न मासों की तृतीया तिथि में करणीय व्रत तथा उनका माहात्म्य), स्कन्द २.१.२९.५१ (वैशाख शुक्ल तृतीया : विष्णु को गन्ध लेपन), ३.२.१८.११७ (माघ कृष्ण तृतीया : श्यामला द्वारा कर्णाटक दैत्य का वध), ४.१.४९.८१ (चैत्र शुक्ल तृतीया : मङ्गला गौरी की पूजा), ४.२.७०.६ (भाद्रपद कृष्ण तृतीया : विशालाक्षी देवी के समक्ष जागरण), ४.२.७०.४१ (चैत्र शुक्ल तृतीया : चित्रघण्टा आदि की पूजा), ४.२.७५.६७ (राध तृतीया को त्रिलोचन लिङ्ग की पूजा), ४.२.८०.८ (मनोरथ तृतीया को विश्वभुजा देवी की पूजा, शची द्वारा मनोरथ तृतीया व्रत का चीर्णन), ४.२.८२.१३७+ (अभीष्ट तृतीया व्रत की विधि व माहात्म्य, मित्रजित् - पत्नी मलयगन्धिनी द्वारा पुत्र प्राप्ति हेतु व्रत का चीर्णन), ४.२.९०.२२ (चैत्र शुक्ल तृतीया : पार्वतीश लिङ्ग की अर्चना), ५.२.४६.१२८ (मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया में करणीय अभीष्ट तृतीया व्रत का वर्णन), ५.३.२६.१०५ (तृतीया तिथि में लवण प्रदान से पति तथा सौभाग्य प्राप्ति का उल्लेख), ५.३.२६.१३४ (चैत्र शुक्ल तृतीया में करणीय दुःख व दौर्भाग्य नाशक व्रत विधि का वर्णन), ५.३.१०६.९ (कामद तीर्थ में ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया में पञ्चाग्नि सेवन से सम्पूर्ण पापों के नाश का उल्लेख), ६.४२+ (चैत्र शुक्ल तृतीया : विश्वामित्र व मेनका का आख्यान), ६.१३० (मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया :शाण्डिली द्वारा याज्ञवल्क्य - पत्नी कात्यायनी को बोध), ६.१३०.३५ (गौरी द्वारा स्थापित पञ्च पिण्ड पूजा), ६.१५३ (चैत्र शुक्ल तृतीया : रूप तीर्थ का माहात्म्य, तिलोत्तमा की कथा), ६.१७८ (श्रावण कृष्ण तृतीया : पद्मावती द्वारा उमा - महेश्वर पूजा से विष्णु - पत्नी लक्ष्मी बनना), ७.१.५७ (माघ तृतीया : सौभाग्य प्राप्ति हेतु गौरी व्रत), ७.१.९८.१८( भाद्रपद कृष्ण तृतीया : धरित्री लिङ्ग पूजा), ७.१.११६ (माघ तृतीया : शङ्खोदक तीर्थ में कुण्डेश्वरी की पूजा), ७.१.१२० (चैत्र शुक्ल तृतीया : गोपीश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.१२४ ( माघ शुक्ल तृतीया : सौभाग्य प्रदायक गौरी की पूजा), ७.१.१५७ (माघ तृतीया : सत्यभामेश्वर लिङ्ग की पूजा), ७.१.१८५ (माघ तृतीया : वडवा विग्रह रूप में सरस्वती पूजा), ७.१.२६१ (वैशाख शुक्ल तृतीया :न्यङ्कुमती नदी में स्नान), ७.१.२६५ (चैत्र शुक्ल तृतीया : कनकनन्दा देवी की पूजा), ७.१.२८७ (अजापालेश्वरी देवी की पूजा), ७.१.२९१ (चैत्र तृतीया : भद्रकाली की पूजा), ७.१.३४८ (श्रावण शुक्ल तृतीया : मन्त्र विभूषणा गौरी की पूजा), ७.३.१२.४(माघ शुक्ल तृतीया : रूप तीर्थ में स्नान), लक्ष्मीनारायण १.२६८ (१२ मासों की तृतीया तिथि में करणीय विभिन्न व्रतों का वर्णन), १.३१० (पुरुषोत्तम मास में द्वितीय पक्ष की तृतीया तिथि में किए गए व्रत के प्रभाव से राजा व रानी को दिव्य शरीर की प्राप्ति), १.४८६.३ (चैत्र शुक्ल तृतीया : मध्याह्न सूर्यवार के प्रभाव से जल में प्राण त्याग करने पर मृगी के मेनका नामक अप्सरा बनने का उल्लेख), १.५००.५८ (माघ शुक्ल तृतीया :शनिवार के प्रभाव से कर्णोत्पला को नदी में स्नान से दिव्य रूप की प्राप्ति), १.५०१.११५ (वैशाख तृतीया में कात्यायन द्वारा वास्तु पूजा, वास्तु पूजा से दोष शान्ति), २.१२३.३० (ओबीरात्रीश नदी के सङ्गम पर तृतीय यज्ञ का आयोजन, पौष कृष्ण तृतीया तिथि में समारम्भ तथा नवमी में समापन का उल्लेख), २.२२१.५६ (आश्विन कृष्ण तृतीया को श्रीहरि के बाल्यरज नृप की राजधानी में गमन आदि का वर्णन), २.२४०.८ (वीतिहोत्र महायोगी का मार्गशीर्ष तृतीया में हरि दर्शनार्थ अश्वपट्ट सरोवर पर आगमन), ३.१०३.३ (तृतीया तिथि में स्वर्ण , गो आदि के दान से श्रेष्ठ वाजि प्राप्ति का उल्लेख), ४.६१.६६ (चैत्र शुक्ल तृतीया में सारहास मण्डलवर्ती लोगों को मुक्ति प्राप्ति), ४.७०.१८ (वैशाख शुक्ल तृतीया में लोमश ऋषि का आगमन व संहिता पूजन ) । triteeyaa/ tritiya