EIGHTH DAY - ASHTAMI
गौरी
नवरात्र प्रतिपदा को शैलपुत्री को वृषभारूढ दिखाया गया था। उसके पश्चात् द्वितीया तिथि को ब्रह्मचारिणी देवी को बिना वाहन के प्रदर्शित किया गया। तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी व षष्ठी तिथि की देवियों को सिंह या शार्दूल पर स्थित दिखाया गया। सप्तमी तिथि की देवी कालरात्रि को गर्दभ पर आरूढ दिखाया गया। अब अष्टमी तिथि की देवी महागौरी को श्वेत वृषभ पर आरूढ, श्वेताम्बर धारण किए हुए दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि अब प्राणों में रौद्रता समाप्त हो गई है, प्राण सौम्य बन गए हैं। एक संदर्भ में गौरी को अघोर शिव के साथ सम्बद्ध किया गया है। इसका अर्थ होगा कि गौरी नामक प्रकृति का पूर्व रूप घोरी रहा है जो अब बदल कर गौरी हो गया है। दूसरे संदर्भ में गौरी को वरुण की शक्ति कहा गया है। वरुण का कार्य पापों का क्षालन करना होता है। अतः गौरी का कार्य भी पापों का क्षालन करना, श्मशान को प्रस्तुत करना होना चाहिए जो एक घोर कार्य ही है। पापों का क्षालन गौरी किस प्रकार करती है, इस विषय में ऋग्वेद की निम्नलिखित ऋचा उपयोगी हो सकती है -
गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी ।
अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥
यह ऋचा वैदिक साहित्य की सार्वत्रिक ऋचा है। कहा गया है कि गौरी मिमा कर सलिलों का तक्षण करती है। वह एकपदी बनती है, द्विपदी बनती है, चतुष्पदी बनती है, अष्टापदी, नवपदी और सहस्रपदी बन जाती है। अव्यक्तानन्द की स्थिति को सलिल कहा जाता है। यह अनगढी स्थिति है। इसे गढ कर, तक्षण करके शुद्ध बनाना है। सबसे अच्छा उदाहरण तो विश्वकर्मा द्वारा तक्षण का है जिसके द्वारा वह कल्पवृक्ष का ही निर्माण कर देता है। लेकिन यहां पदों के द्वारा तक्षण का उल्लेख किया जा रहा है। पद का अर्थ है – हम अपने परितः स्थित समाज को, परिस्थितियों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं, उन्हें गतिमान बना सकते हैं, वैसे ही जैसे सूर्य अपनी किरण रूपी पद से सारे विश्व को गतिमान बना देता है। यास्काचार्य द्वारा एकपदी, द्विपदी का क्या अर्थ होता है, इसकी व्याख्या करने का प्रयास किया गया है। मनुष्य के पापों का क्षालन गौरी द्विपदी होकर करती है, इसलिए मनुष्य दो पैर वाला है, दो स्तनों वाला है। डा. फतहसिंह कहा करते थे कि दैवी त्रिलोकी व मानुषी त्रिलोकी, यह मनुष्य के दो वास्तविक पाद हैं। वह चाहे तो देव बन सकता है, चाहे मनुष्य। इसके पश्चात् पशुओं में गौरी चतुष्पदी होकर क्षालन करती है, अतः वह चार पादों वाले, चार स्तनों वाले होते हैं। डा. फतहसिंह के अनुसार अन्नमय कोश, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय यह पशु के चार पाद हैं और पशु की जीवात्मा पांचवां हिरण्मय कोश है। चार दिशाओं को भी गौरी के चार पाद कहा गया है। फिर अष्टापदी गौरी के रूप में कहा जा सकता है कि यद्यपि पशु चार पाद वाले होते हैं, लेकिन उनके खुर दो भागों में विभाजित रहते हैं, अतः वह चार पाद वाले होते हुए भी आठ पाद वाले बन जाते हैं। दूसरा तर्क आठ दिशाओं का है कि चार तो मुख्य दिशाएं हैं और चार अवान्तर दिशाएं हैं । इन आठ दिशाओं की व्याख्या अष्टसखी तथा श्रीसूक्त शब्दों के संदर्भ में की जा चुकी हैं। ज्ञान, ऐसा ज्ञान जो सूर्य की किरणों की भांति सब ओर फैल जाए, यह पूर्व दिशा का कार्य है। श्रद्धा, जिससे हमारे संशय, अश्रद्धा मिट जाए, यह आग्नेय दिशा है। दक्षता प्राप्ति अथवा चित्र स्थिति को नक्षत्र स्थिति में बदलना दक्षिण दिशा है। भूख – प्यास, काम, क्रोध आदि रौद्र स्थितियों को भद्रता में रूपान्तरित करना, अवचेतन मन को मन्त्र स्थिति तक रूपान्तरित करना नैर्ऋत दिशा है। पाप क्षालन करके श्मशान, शून्य स्थिति उत्पन्न करना और उस शून्य स्थिति में भी रस उत्पन्न करना यह वरुण की पश्चिम दिशा है। वायव्य दिशा गुरुत्वाकर्षण के विपरीत प्रगति करके गन्ध उत्पन्न करने की दिशा है। उत्तर दिशा ऋणात्मकता से धनात्मकता की ओर जाने की दिशा है। ईशान कोण प्रिय बनने की, अपने आवेगों, शकुनों को विद्युत की गति देने की दिशा है। पितृ कर्म में चार अवान्तर दिशाओं का ही प्रयोग किया जाता है। देवकर्म में चार मुख्य दिशाओं का प्रयोग किया जाता है। अष्टापदी के रूप में काल्पनिक पशु शरभ को भी उद्धृत किया जा सकता है जिसके चार पैर नीचे की ओर होते हैं, चार पैर ऊपर की ओर। शरभ सिंह पर नियन्त्रण पा लेता है। ऊपर और नीचे के पादों को अन्तर्मुखी व बहिर्मुखी स्थिति कहा जा सकता है। शरभ को क्षरभ, क्षर स्थिति को भरने वाला कहा जा सकता है। लक्ष्मीनारायण संहिता में गौरी मूर्ति का विसर्जन करते समय व्याघ्र असुर पर नियन्त्रण करने के लिए शरभ को भी कथा में स्थान दिया गया है।
नवपदी गौरी के रूप में कहा गया है कि आठ दिशाओं के अतिरिक्त अब ऊर्ध्वदिशा को भी सम्मिलित कर लिया गया है। आठ दिशाएं तो तिर्यक् हैं, संसार में फैलने की दिशा हैं,  नवीं दिशा ऊर्ध्व दिशा है। मन्त्र में नवपदी से आगे केवल परम व्योम में सहस्राक्षरा कह दिया गया है। सुब्रह्मण्या आह्वान में तो कहा जाता है – सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते पृथिवी पादः, सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते अन्तरिक्षं पादः, सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते द्यौः पादः, सासि सुब्रह्मण्ये तस्यास्ते दिशः पादः। परोरजास्ते पंचमः पादः। इस कथन में ऊर्ध्वदिशा में प्रगति भी सम्मिलित है, तिर्यक् दिशा में भी।
     पुराणों में तो काली से गौरी बनने के तथ्य को एक व्यङ्ग के रूप में लेकर तथ्य की गुरुता को समाप्त कर दिया गया है। आधुनिक विज्ञान में तथ्य की गुरुता बनी हुई है। तापगतिकी के दूसरे अकाट्य नियम के अनुसार सारी प्रकृति उस ओर अग्रसर हो रही है जहां उसकी अव्यवस्था की माप में, एण्ट्रांपी में वृद्धि हो रही है और जिससे बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं है। एक दिन सारा  विश्व कार्य करने के अनुपयुक्त हो जाएगा। हम जो भी उपयोगी कार्य करते हैं, उससे ऊर्जा का एक अंश अनुपयोगी भी निर्मित हो जाता है। आधुनिक विज्ञान में एक आइन्स्टीन विरोधाभास (पैराडांक्स) है। यह कल्पना की गई कि यदि कोई व्यक्ति किसी तन्त्र से छांट – छांट कर कम अव्यवस्था के कणों को अलग करता जाए तो काले –गोरे को अलग किया जा सकता है। लेकिन अन्त में पाया गया कि इस कार्य में जो व्यय होगा, वह कुल काल्पनिक कार्य को उल्टी दिशा में ही ले जाएगा।
     हम देख रहे हैं कि जीव उत्पत्ति के माध्यम से प्रकृति अपने आपको काली से गोरी बनाने का प्रयास कर रही है। जीव को अधिक व्यवस्थित माप वाली प्रकृति के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि जीव अजर – अमर भी बन जाए तो इसे गौरी के सहस्राक्षरा होने के तुल्य कहा जा सकता है।
     कहा गया है कि हिमालय – पुत्री ने गौरी बनने हेतु तपस्या के लिए जिस स्थान को चुना था, वह स्थान वह है जहां हिमालय पर गंगा का अवतरण होता है। यह गंगा ज्ञान की गंगा है, अथवा सोम की गंगा है, अथवा पुण्यकर्म रूपी जल की गंगा है, यह भविष्य में अन्वेषणीय है। पुराणों में सार्वत्रिक रूप से कथन है कि गंगा, गायत्री, गौरी यह सब समानार्थक हैं। जो पूजा गौरी के लिए विहित है, वही गंगा के लिए भी है।
     नवरात्र के संदर्भ में अष्टमी को महागौरी की अर्चना का निर्देश है। लेकिन महागौरी से क्या तात्पर्य है, यह स्पष्ट नहीं हो सका है। सांझी के लेख के अनुसार अष्टमी को सांझी के समझ अष्टदलकमल रखते हैं। अष्टदलकमल की व्याख्या इस प्रकार की जाती है कि हृदय 12 दल वाला कमल है जिसमें क, ख, ग, घ, ङ्, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ यह 12 अक्षर दलों पर विद्यमान हैं। इस द्वादशदल कमल के अन्दर अष्टदलकमल के रूप में वृन्दावन विद्यमान है। बहुत से सम्प्रदायों की साधना का केन्द्र यही अष्टदलकमल है। इसे प्रेम का केन्द्र कहा जाता है। रजनीश के अनुसार अनाहत चक्र नाम वाले इस केन्द्र पर चेतना की स्थिति इस प्रकार होती है कि जैसे कोई चेतना बोतल में बन्द हो, लेकिन उसकी सामर्थ्य बोतल से बाहर निकलने की भी है। 
 
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Vipin Kumar

 
 
 
१,०८४.१०  स्वादोरित्था विषूवतो मध्वः पिबन्ति गौर्यः ।
१,०८४.१० या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभसे वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥
१,१६४.४१  गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी ।
१,१६४.४१ अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥
४,०१२.०६  यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः ।
४,०१२.०६ एवो ष्वस्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः ॥
९,०१२.०३  मदच्युत्क्षेति सादने सिन्धोरूर्मा विपश्चित् ।
९,०१२.०३ सोमो गौरी अधि श्रितः ॥
१०,१२६.०८  यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः ।
१०,१२६.०८ एवो ष्वस्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः ॥
गौरीं – गौरवर्णां सोमक्रयणीं गाम्। अमुञ्चत – विश्वावसोर्गन्धर्वान्मोचितवन्तः। पदि षितां – पदे बद्धां। ऋ. – कुल्मलबर्हिः शैलूषः, अंहोमुक् वामदेवो वा
(२०.१०९.१ ) स्वादोरित्था विषुवतो मध्वः पिबन्ति गौर्यः ।
(२०.१०९.१ ) या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभसे वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥१॥
सद्यो जातं मही पूषा रमा ब्रह्मा त्रिवृत्स्वरः ॥ १॥  ऋग्वेदो गार्हपत्यं च मन्त्राः सप्तस्वरास्तथा । वर्णं पीतं क्रिया शक्तिः सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ २॥  अघोरं सलिलं चन्द्रं गौरी वेद द्वितीयकम् । नीरदाभं स्वरं सान्द्रं दक्षिणाग्निरुदाहृतम् ॥ ३॥  पञ्चाशद्वर्णसंयुक्तं स्थितिरिच्छाक्रियान्वितम् । शक्तिरक्षणसंयुक्तं सर्वाघौघविनाशनम् ॥ ४॥  सर्वदुष्टप्रशमनं सर्वैश्वर्यफलप्रदम् । वामदेवं महाबोधदायकं पावकात्मकम् ॥ ५॥  विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम् । प्रसन्नं सामवेदाख्यं नानाष्टकसमन्वितम् ॥ ६॥  धीरस्वरमधीनं चाहवनीयमनुत्तमम् । ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम् ॥ ७॥  वर्णं शुक्लं तमोमिश्रं पूर्णबोधकरं स्वयम् । धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम् ॥ ८॥  सर्वसौभाग्यदं नॄणां सर्वकर्मफलप्रदम् । अष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम् ॥ ९॥  यत्तत्पुरुषं प्रोक्तं वायुमण्डलसंवृतम् । पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम् ॥ १०॥  पञ्चाशत्स्वरवर्णाख्यमथर्ववेदस्वरूपकम् । कोटिकोटिगणाध्यक्षं ब्रह्माण्डाखण्डविग्रहम् ॥ ११॥  वर्णं रक्तं कामदं च सर्वाधिव्याधिभेषजम् । सृष्टिस्थितिलयादीनां कारणं सर्वशक्तिधृक् ॥ १२॥  अवस्थात्रितयातीतं तुरीयं ब्रह्मसञ्ज्ञितम् । ब्रह्मविष्ण्वादिभिः सेव्यं सर्वेषां जनकं परम् ॥ १३॥  ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम् । आकाशात्मकमव्यक्तमोङ्कारस्वरभूषितम् ॥ १४॥  सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्बहिः । अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम् ॥ १५॥  पञ्चकृत्यनियन्तारं पञ्चब्रह्मात्मकं बृहत् । पञ्चब्रह्मोपसंहारं कृत्वा स्वात्मनि संस्थितः ॥ १६॥  स्वमायावैभवान्सर्वान्संहृत्य स्वात्मनि स्थितः । पञ्चब्रह्मात्मकातीतो भासते स्वस्वतेजसा ॥ १७॥ - पञ्चब्रह्मोपनिषत्
सुभगायै विद्महे कमलमालिन्यै धीमहि । तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥ महानारायणोप.
 
रुद्रः प्रसिद्धो गौरीशः सर्वः सर्वात्मकः स्मृतः ॥ ३०१॥ याज्ञिक्युपनिषद्विवरणम्
चतुर्मुखी जगद्योनिः प्रकृतिर्गौः प्रतिष्ठिता  ॥ १,१६.३३ ॥
गौरी माया च विद्या च कृष्णा हैमवतीति च  ।
प्रधानं प्रकृतिश्चैव यामाहुस्तत्त्वचिन्तकाः  ॥ १,१६.३४ ॥
अजामेकां लोहितां शुक्लकृष्णां विश्वप्रजां सृजमानां सरूपाम्  ।
अजोऽहं मां विद्धि तां विश्वरूपं गायत्रीं गां विश्वरूपां हि बुद्ध्या  ॥ १,१६.३५ ॥
-लिंग पु
अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैवैकपाटला  ।
उमा हैमवती चैव कल्याणी चैकमातृका  ॥ १,७०.३३२ ॥
ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरीति विश्रुता  ।
गणांबिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी  ॥ १,७०.३३३ ॥ लिंग
यस्माच्चतुष्पदा ह्येषा त्वया दृष्टा सरस्वती।
तस्माच्च पशवः सर्वे भविष्यन्ति चतुष्पदाः।
तस्माच्चैषां भविष्यन्ति चत्वारो वै पयोधराः ॥81॥

सोमश्च मन्त्रसंयुक्तो यस्मान्मम मुखाच्च्युतः।
जीवः प्राणभृतां ब्रह्मन् सर्वः पीत्वा स्तनैर्घृतम् ॥82॥

तस्मात् सोममयं चैतदमृतं चैव संज्ञितम्।
चतुष्पादा भविष्यन्ति श्वेतत्वं चास्य तेन तत् ॥83॥

यस्माच्चैवं क्रियाभूत्वा द्विपादा वै महेश्वरी।
दृष्टा पुनस्त्वया चैषा सावित्री लोकभाविनी।
तस्माद्वै द्विपदाः सर्वे द्विस्तनाशचव नराः स्मृताः ॥84॥ वायु 1.23.
ओं हूं ह्रं(३) क्रियाशक्तये नमः । ओं हूं ह्रां हः(४) महागौरी रुद्रदयिते स्वाहेति च(५) पिण्डिकायाम् । अग्नि 96
गौरीप्रतिष्ठाकथनं
 
ईश्वर उवाच
वक्ष्ये गौरीप्रतिष्ठाञ्च पूजया सहितां शृणु  ।९८.००१
मण्डपाद्यं पुरो यच्च(१) संस्थाप्य चाधिरोपयेत् ॥९८.००१
शय्यायान्तांश्च विन्यस्य मन्त्रान्मूर्त्यादिकान् गुह  ।९८.००२
आत्मविद्याशिवान्तञ्च(२) कुर्यादीशनिवेशनं  ॥९८.००२
शक्तिं परां ततो(३) न्यस्य हुत्वा(४) जप्त्वा च पूर्ववत् ।९८.००३
सन्धाय च तथा पिण्डीं(५) क्रियाशक्तिस्वरूपिणीं  ॥९८.००३
सदेशव्यापिकां ध्यात्वा न्यस्तरत्नादिकां तथा  ।९८.००४
एवं संस्थाप्य तां पश्चाद्देवीन्तस्यान्नियोजयेत् ॥९८.००४
परशक्तिस्वरूपान्तां स्वाणुना(६) शक्तियोगतः  ।९८.००५
ततो न्यसेत्क्रियाशक्तिं पीठे ज्ञानञ्च विग्रहे  ॥९८.००५
ततोपि व्यापिनीं शक्तिं समावाह्य नियोजयेत् ।९८.००६
अम्बिकां शिवनाम्नीञ्च समालभ्य(७) प्रपूजयेत् ॥९८.००६
 
ओं आधारशक्तये नमः । ओं कूर्माय नमः । ओं स्कन्दाय च तथा नमः । ओं ह्रीं नारायणाय नमः । ओं ऐश्वर्याय नमः
 
ओं अं अधश्छदनाय नमः । ओं पद्मासनाय नमः । ओं ऊर्ध्वच्छदनाय नमः । ओं पद्मासनाय नमः । अथ सम्पूज्याः केशवास्तथा । ओं ह्रीं कर्णिकाय नमः । ओं क्षं पुष्कराक्षेभ्य(१) इहार्चयेत् । ओं हां पुष्ट्यै ह्रीं च ज्ञानायै ह्रूं क्रियायै ततो नमः । ओं नालाय नमः । रुं धर्माय नमः(२) । रुं ज्ञानाय वै नमः(३) । ओं वैराग्याय वै नमः । ओं वै अधर्माय नमः(४) । ओं रुं अज्ञानाय वै नमः । ओं अवैराग्याय वै नमः । अं अनैश्वर्याय नमः । हुं वाचे हुं च रागिण्यै क्रैं ज्वालिन्यै ततो नमः । ओं ह्रौं शमायै(५) च नमः । ह्रुं ज्येष्ठायै ततो नमः । ओं ह्रौं रौं क्रौं नवशक्त्यै गौं च गौर्यासनाय च । गौं गौरीमूर्तये नमः । गौर्या मूलमथोच्यते । ओं ह्रीं सः(६) महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा । गौर्यै नमः । गां ह्रूं ह्रीं शिवो गूं स्यात्शिवायै कवचाय च । गों नेत्राय च गों अस्त्राय ओं गौं विज्ञानशक्तये, ओं गूं क्रियाशक्तये नमः(७) । पूर्वादौ शाक्रादिकान् । ओं सुं सुभागायै नमः । ह्रीं वीजललिता ततः । ओं ह्रीं कामिन्यै च नमः । ओं
ह्रूं स्यात्कामशालिनीमन्त्रैर्गौरीं प्रतिष्ठाप्य प्रार्च्य जप्त्वाथ सर्वभाक्(८) ॥
इत्याग्नेये महापुराणे गौरीप्रतिष्ठा नामाष्टनवतितमोऽध्यायः
 
ओं ह्रीं गौर्यै नमः
गौरीमन्त्रः सर्वकरः होमाद्ध्यानाज्जपार्चनात् ॥३१२.०१६
रक्ता चतुर्भुजा पाशवरदा दक्षिणे करे  ।३१२.०१७
अङ्कुशाभययुक्तान्तां प्रार्थ्य सिद्धात्मना पुमान्  ॥३१२.०१७
जीवेद्वर्षशतं धीमान्न चौरारिभयं भवेत् ।३१२.०१८
क्रुद्धः प्रसादी भवति युधि मन्त्राम्बुपानतः  ॥३१२.०१८
अञ्जनं तिलकं वश्ये जिह्वाग्रे कविता भवेत् ।३१२.०१९
तज्जपान्मैथुनं वश्ये तज्जपाद्योनिवीक्षणम्  ॥३१२.०१९
स्पर्शाद्वशी तिलहोमात्सर्वञ्चैव तु सिध्यति  ।३१२.०२०
सप्ताभिमन्त्रितञ्चान्नं भुञ्जंस्तस्य श्रियः सदा  ॥३१२.०२०
अर्धनारीशरूपोऽयं लक्ष्म्यादिवैष्णवादिकः  ।३१२.०२१
अनङ्गरूपा शक्तिश्च द्वितीया मदनातुरा  ॥३१२.०२१
पवनवेगा भुवनपाला वै सव्वसिद्धिदा  ।३१२.०२२
 
 
गौरीं यजेद्धेमरूप्यां काष्ठजां शैलजादिकां  ।३२५.००८
पञ्चपिण्डां तथाव्यक्तां कोणे मध्ये तु पञ्चमं(१)  ॥३२५.००८
ललिता सुभगा गौरी क्षोभणी चाग्नितः क्रमात् ।३२५.००९
 
गौरी पाशाङ्कुशधरा टङ्कशूलधरो हरः नारद 1.68
चैत्रशुक्लतृतीयायां गौरीं कृत्वा सभर्तृकाम्
सौवर्णीं राजतीं वापि ताम्रीं वा मृण्मयीं द्विज २
अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैर्वस्त्रैर्वराभरणैः शुभैः
दूर्वाकांडैश्च विधिवत्सोपवासा तु कन्यका ३
वरार्थिनी च सौभाग्यपुत्रभर्त्रर्थिनी तथा
द्विजभार्या भर्तृमतीः कन्यकां वा सुलक्षणाः ४
सिंदूरांजनवस्त्राद्यैः प्रतोष्य प्रीतमानसा
रात्रौ जागरणं कुर्याद्व्रतसंपूर्तिकाम्यया ५
ततस्तां प्रतिमां विप्र गुरवे प्रतिपादयेत्
धातुजां मृन्मयीं वा तु निक्षिपेच्च जलाशये ६
एवं द्वादशवर्षाणि कृत्वा गौरीव्रतं शुभम्
धेनुद्वादशसंकल्पं दद्यादुत्सर्गसिद्धये ७
किमत्र बहुनोक्तेन गौरी सौभाग्यदायिनी
स्त्रीणां यथा तथा नान्या विद्यते भुवनत्रये ८
धनं पुत्रान्पतिं विद्यामाज्ञासिद्धिं यशः सुखम्
लभते सर्वमेवेष्टं गौरीमभ्यर्च्य भक्तितः ९
राधशुक्लतृतीया या साक्षया परिकीर्तिता
तिथिस्त्रेतायुगाद्या सा कृतस्याक्षयकारिणी १०
नारद 1.112
यदा तृतीया भाद्रे तु हस्तर्क्षसहिताभवेत्
हस्तगौरीव्रतं नाम तदुद्दिष्टं हि शौरिणा ३७ नारद 1.112
इषशुक्लतृतीयायां बृहद्गौरीव्रतं चरेत् ४५
पंचवर्षं विधानेन पूर्वोक्तेनैव नारद
आचार्यं पूजयेदंते विप्रानन्यान्धनादिभिः ४६
सुवासिनीः पंच पूज्या वस्त्रालंकारचन्दनैः
कंचुकैश्चैव ताटंकैः कंठसूत्रैर्हरिप्रियाः ४७
वंशपात्राणि पंचैव सूत्रैः संवेष्टितानि च
सिंदूरं जीरकं चैव सौभाग्यद्रव्यसंयुतम् ४८
गोधूमपिष्टजातं च नवापूपं फलादिकम्
वायनानि च पंचैव ताभ्यो दद्याच्च भोजयेत् ४९
अर्घं दत्त्वा वायनानि पश्चाद्भुंजीत वाग्यता
तत्फलं धारयेत्कंठे सर्वकामसमृद्धये 1.112.५०
ततः प्रातः समुत्थाय सालंकारा सखीजनैः
गीतवाद्ययुता नद्यां गौरीं तां तु विसर्जयेत् ५१
आहूतासि मया भद्रे पूजिता च यथा विधि
मम सौभाग्यदानाय यथेष्टं गम्यतां त्वया ५२
एवं कृत्वा व्रतं भक्त्या द्विज देवीप्रसादतः
भुक्त्वा भोगांस्तु देहांते गौरीलोकमवाप्नुयात् ५३
ऊर्जशुक्लतृतीयायां विष्णुगौरीव्रतं चरेत्
पूजयित्वा जगद्वन्द्यामुपचारैः पृथग्विधैः ५४
सुवासिनीं भोजयित्वा मङ्गलद्रव्यपूजिताम्
विसर्जयेत्प्रणम्यैनां विष्णुगौरीप्रतुष्टये ५५
मार्गशुक्लतृतीयायां हरगौरीव्रतं शुभम्
कृत्वा पूर्वविधानेन पूजयेज्जगदंबिकाम् ५६
एतद्व्रतप्रभावेण भुक्त्वा भोगान्मनोरमान्
देवीलोकं समासाद्य मोदते च तया सह ५७
पौषशुक्लतृतीयायां ब्रह्मगौरीव्रतं चरेत्
पूर्वोक्तेन विधानेन पूजितापि द्विजोत्तम ५८
ब्रह्मगौरीप्रसादेन मोदते तत्र संगता नारद 1.112
माघशुक्लचतुर्थ्यां तु गौरीव्रतमनुत्तमम्
तस्यां तु गौरी संपूज्या संयुक्ता योगिनीगणैः ८०
नरैः स्त्रीभिर्विशेषेण कुंदपुष्पैः सकुंकुमैः
रक्तसूत्रै रक्तपुष्पैस्तथैवालक्तकेन च ८१
धूपैर्दीपैश्च बलिभिः सगुडेनार्द्र केण च
पयसा पायसेनापि लवणेन च पालकैः ८२
पूज्याश्चाविधवा नार्यस्तथा विप्राः सुशोभनाः
सौभाग्यवृद्धये देयो भोक्तव्यं बंधुभिः सह ८३
इदं गौरीव्रतं विप्र सौभाग्यारोग्यवर्द्धनम्
प्रतिवर्षं प्रकर्त्तव्यं नारीभिश्च नरैस्तथा ८४ नारद 1.112
 
कोकिलाव्रतमप्यत्रप्रोक्तंतद्विधिरुच्यते।।पूर्णिमायांसमारभ्यव्रतंस्नायाद्बहिर्जले।।१८।।पूर्णांतंश्रावणेमासिगौरीरूपांचकोकिलाम्।।स्वर्णपक्षांरत्ननेत्रांप्रवालमुखपंकजाम्।।१९।।कस्तूरीवर्णसंयुक्तामुत्पन्नांनंदनेवने।।चूतचंपकवृक्षस्थांकलगीतनिनादिनीम्।।1.124.२०।।चिंतयेत्पार्वतींदेवींकोकिलारूपधारिणीम्।।गंधाद्यैःप्रत्यहंप्रार्च्चेल्लिखितांवर्णकैःपटे।।२१।। नारद 1.124
 
यथा गौरी तथा गङ्गा तस्माद्गौर्यास्तु पूजने
विधिर्यो विहितः सम्यक्सोऽपि गङ्गाप्रपूजने ९१ नारद 2.43

वारुणीवैतथागौरीवायोर्वैसुप्रभातथा११७ –पद्म 1.16
दानकालेचसर्वत्रमंत्रमेतमुदीरयेत्१५७
गौरीमेप्रीयतांनित्यमघनाशायमंगला
सौभाग्यायास्तुललिताभवानीसर्वसिद्धये१५८ पद्म 1.22
 



 
 
गौरी कन्या प्रधाना वै मध्यमा कन्यका मता ।। रोहिणी तत्समा ज्ञेया अधमा च रजस्वला ।। ८२ ।।
अप्राप्ते रजसि गौरी प्राप्ते रजसि रोहिणी ।। अव्यंजनकृता कन्या कुचहीना तु नग्निका ।। ८३ ।।
सप्तवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु नग्निका ।। दशवर्षा भवेत्कन्या ह्यत ऊर्ध्वं रजस्वला ।। ८४ ।। स्कन्द 7.1.205
व्यंजनैर्हन्ति वै पुत्रान्कुलं हन्यात्पयोधरा ।। गतिमिष्टां तथा लोकान्हंति सा रजसा पितुः ।। ८५ ।।
 
 
 
 
 
 
 
 
गौरी अग्नि ५२.१४ ( गौरी प्रतिमा का लक्षण ), ९८ ( गौरी - प्रतिष्ठा विधि का वर्णन ), ११३.४ ( गौरी का पर्वत पर श्रीदेवी रूप धारण करके तप, हरि से वर प्राप्ति, पर्वत की श्रीपर्वत रूप से प्रसिद्धि का कथन ), ३१३.१९ ( गौरी मन्त्र, ध्यान स्वरूप व मन्त्र महिमा का कथन ), ३२६.१ ( गौरी पूजा विधान ), गणेश २.१२८.२७ ( सिन्दूर दैत्य द्वारा गौरी का हरण , शिव व गणेश द्वारा मोचन का उद्योग ), नारद १.११३.८० ( माघ शुक्ल चतुर्थी में करणीय गौरी व्रत की विधि व माहात्म्य ), पद्म १.१६.११७ (गौरी के वरुण की पत्नी होने का उल्लेख), १.२०.५२ ( गौरी व्रत विधि का कथन ), १.२२.६३ ( मास अनुसार गौरी पूजा की विधि का वर्णन ), ६.२०१.१०१( गौरी अर्चना का गौ सेवा से तादात्म्य ), ब्रह्माण्ड १.२.११.१४ ( विरज - पत्नी, सुधामा - माता ), १.२.१६.३३( महागौरी : विन्ध्य पर्वत से नि:सृत नदियों में से एक ), १.२.१९.७५ ( क्रौञ्च द्वीप की ७ प्रधान नदियों में से एक ), १.२.२५.१८ ( पार्वती का एक नाम ), २.३.६३.६७ ( युवनाश्व - पत्नी , मान्धाता - माता गौरी का पति शाप से बाहुदा नदी बनने का उल्लेख ), ३.४.४४.५८ ( वर्ण शक्तियों में से एक शक्ति ), मत्स्य १३.२९ ( कान्यकुब्ज में गौरी नाम से सती देवी की स्थिति का उल्लेख ), २२.३१( पितर श्राद्ध हेतु गौरी तीर्थ की प्रशस्तता का उल्लेख ), २२.७६ ( पितर श्राद्ध हेतु गौरी शिखर तीर्थ की प्रशस्तता का उल्लेख ), ४९.८ ( रन्तिनार व मनस्विनी - कन्या, मान्धाता - माता, पूरु वंश ), ६२.२२ ( भिन्न - भिन्न मासों में भिन्न - भिन्न पुष्पों तथा नैवेद्य से गौरी - पूजा के विधान का कथन ), १०१.८ ( गौरी व्रत की विधि व माहात्म्य ), १०१.१६ ( सौभाग्य व्रत के प्रभाव से गौरी लोक में वास का उल्लेख ), १२२.८८ ( क्रौञ्च द्वीप की सात गङ्गाओं मे से एक ), २९०.१० ( २८वें कल्प का नाम ), वराह २२ ( हिमालय - पुत्री के रूप में गौरी की उत्पत्ति, शिव से विवाह का प्रसंग ), वायु ४३.३८ ( पार्वती का एक नाम ), ४९.६९ ( क्रौञ्च द्वीप की सात प्रधान नदियों में से एक ), ८८.६५ ( युवनाश्व - पत्नी, मान्धाता - माता, शाप से गौरी के बाहुदा नदी बनने का उल्लेख ), ९९.१३० ( रन्तिनार व सरस्वती - पुत्री, मान्धाता - माता ), विष्णु २.४.५५ ( क्रौञ्च द्वीप की सात मुख्य नदियों में से एक ), ५.३२.१२ ( पार्वती का एक नाम ), विष्णुधर्मोत्तर १.४१.५(वरुण पुरुष, गौरी प्रकृति), १.२०७.४३ ( गौरी नदी की शतद्रु नाम से ख्याति, गौरी महिमा का कथन ), शिव ५.३७.४३ ( प्रसेनजित् - भार्या, पति शाप से बाहुदा नदी बनने का उल्लेख ), स्कन्द ४.१.४९.५५ ( सूर्य द्वारा मङ्गलाष्टक स्तोत्र द्वारा मङ्गला गौरी की स्तुति ), ४.२.९७.१४७ ( गौरी कूप में स्नान से सम्पूर्ण जडता नाश का उल्लेख ), ५.३.१९८.६६ ( कान्यकुब्ज तीर्थ में उमा की गौरी नाम से स्थिति का उल्लेख ), ६.१३० ( सौभाग्य प्राप्ति हेतु पञ्चपिण्डिका गौरी पूजा विधि, शाण्डिली द्वारा कात्यायनी को बोध, गौरी द्वारा शिव की प्रीति प्राप्ति हेतु तप का वर्णन ), ६.१७७ ( पञ्च पिण्डिका गौरी की पद्मावती द्वारा पूजा से सौभाग्य प्राप्ति की कथा ), ६.१७८.२९(गोमय-निर्मित गौरी के पूजन से गोलोक प्राप्ति का उल्लेख), स्कन्द ७.१.६८ ( पार्वती द्वारा स्थापित गौरीश्वर लिङ्ग का माहात्म्य, काली का तप से गौरी बनने का वृत्तान्त ), ७.१.१०५.५१ ( २७वें कल्प का नाम ), ७.१.२०५.८३ ( कन्याओं के अनेक प्रकारों में अप्राप्त रजस तथा सप्तवर्षीया कन्या की गौरी संज्ञा का उल्लेख ), ७.१.३४८ ( मन्त्रविभूषणा गौरी के पूजन से दुःख नाश का उल्लेख ), लक्ष्मीनारायण १.१८६.३२ ( शिव प्राप्ति हेतु गौरी शृङ्ग पर पार्वती द्वारा तप, ऋषियों के द्वारा निवारित किए जाने पर भी तप में स्थित गौरी की सप्तर्षियों द्वारा परीक्षा, आशीर्वाद प्रदान का वर्णन ), १.३३०.१८ ( जलन्धर व शिव के द्वन्द्व युद्ध में जलन्धर द्वारा मायामयी गौरी का निर्माण तथा मरण ), १.३३०.७८ ( वृन्दावन में धात्री वृक्ष के गौरी का अंश होने का उल्लेख ), १.५०८.१(पञ्च-पिण्डिका गौरी पूजन से अमा के लक्ष्मी बनने का वृत्तान्त), २.३३.४ ( गौरी व्रत के पश्चात् गौरी विसर्जन का वर्णन ), कथासरित् १४.३.१०५(गौरी विद्या का स्वरूप), १४.३.१३२ ( नरवाहनदत्त की तपस्या से संतुष्ट हुए शिव - गौरी द्वारा नरवाहनदत्त को गौरी नामक विद्या प्रदान करने का उल्लेख ) । gauri/gauree